निर्दोष शिक्षक सेवाराम धुर्वे की तत्काल बहाली हो, शिक्षक मनोज आरसे को बताया जा रहा फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड
प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने दोषी शिक्षक पर अविलंब कार्यवाही की मांग को लेकर मय संलग्न दस्तावेजों के एक पत्र सौंपा है । प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश महामंत्री श्री मोहन लाल चौहान द्वारा वनग्राम जाम में विस्थापितों को लेकर हुए फर्जीवाड़े पर तत्काल सख्त कार्यवाही की मांग की है ।
आपको बता दें कि आयुक्त नर्मदापुरम, जिला कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ एवं जिला शिक्षा अधिकारी को पार्टी की और से सौंपे गए पत्र में बताया कि शिक्षक सेवाराम धुर्वे निर्दोष है । शिकायत पत्र में उल्लेख है कि सेवाराम धुर्वे की पद स्थापना वनग्राम जाम में वर्ष 1995 से लेकर 30/04/1998 तक रही है । जबकि वन ग्राम जाम का विस्थापन 2015-16 में हुआ था । सेवा अवधि के दौरान पदक्रमोन्नति का लाभ देते हुये धुर्वे को शासकीय प्राथमिक शाला खामदा में पदस्थ किया गया था ।
धुर्वे के स्थानांतरण के बाद मनोज आरसे को वनग्राम जाम में पदस्थ किया गया था।
जानकारी के मुताबिक वर्ष 1998 से 2017 तक मनोज आरसे ने वनग्राम शाला जाम का कार्यभार संभाला । इसी बीच शासन द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार वनग्राम जाम के विस्थापन की कार्यवाही सतपुड़ा टाइगर रिजर्व द्वारा की गई । आदिवासियों के विस्थापन की पात्रता का निर्धारण स्कूल की दाखिल खारिज पंजी में दर्ज जन्मतिथि के अनुसार होने की बात सामने आ रही है। इसी आधार पर विस्थापितों की पात्रता को लेकर वनग्राम शाला जाम में अध्ययनरत छात्र- छात्रों की उम्र का निर्धारण एसडीएम राजस्व द्वारा किया गया । समूची कार्यवाही शिक्षक मनोज आरसे के कार्यकाल की बताई जा रही है । विस्थापितों को लेकर शाला की दाखिला पंजी में जो हेराफेरी और कांट-छांट की बात सामने आई है उसे शिक्षक मनोज आरसे द्वारा करना बताया जा रहा है । कयास लगाए जा रहें हैं कि मामले में लीपापोती करके निर्दोष शिक्षक सेवाराम धुर्वे को दोषी बताकर उनके विरुद्ध निलंबन की कार्यवाही की गई ।
एक दिन मे 28 विद्यार्थियों के प्रवेश
आवेदक ने खुलासा किया कि आर टी आई के तहद विस्थापित ग्राम जाम के दाखिला रिकार्ड और परीक्षाफल की जानकारी प्राप्त की गई थी । प्राप्त जानकारी से सामने आया कि आरसे ने घालमेल के चलते लाखों रुपये लेकर दिनांक 18/11/1995 को एक ही दिन में 28 छात्र छात्राओं को प्रवेश दिया था । इसी को लेकर आरसे की पूरी कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आकर खड़ी हो चुकी है ।
शिकायत पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि फिलहाल विस्थापन में हुये भ्र्ष्टाचार की जांच लोकायुक्त में भी पेंडिंग है और कार्यवाही का इंतजार है। हालांकि कार्यवाही का निर्धारण अभी तक क्यों नहीं हो सका है ? अब देखना यह है क्या मिलीभगत से आदिवासियों के विस्थापन में आदिवासी शिक्षक को ही उलझाया गया? या फिर फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड मनोज आरसे है फ़िलहाल मामले की निष्पक्ष जांच के बाद ही खुलासा होने की संभावनाएं जताई जा रही है ।