लखनऊ : १९३६ में वक्फ बोर्ड बना.परन्तु राममंदिर परिसर वक्फ की संपत्ति नहीं है। 23 मार्च 1528 पूर्व से श्री पंच रामानंदीय निर्मोही आखाडा की संपत्ति है। दिनांक 16 सप्त.1938 फ़ैजाबाद जिला वक्फ आयुक्त ने सै.महम्मद झाकी शिया के कथनानुसार, इस विवादित वास्तु में मुसलमान नमाज पढ़ने के इच्छुक नहीं, इस्लाम की मान्यता के अनुसार मंदिर को पाक नहीं मानते। लिखा है।

           ऐसे में,1950 पक्षकार हिंदू महासभा मुस्लिम पक्ष की कोई दलील सुनने को तयार नहीं। राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रमोद पंडित जोशी ने आगे कहा, 14 जुलाई 1941फ़ैजाबाद नझूल विभाग ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर-परिसर,रामकोट अयोध्या 67:77 एकड भूमि को प्लाट क्र.583 से पंजीकृत किया है। वर्णन-तीन गुंबद मंदिर , कब्ज़ा-श्री पंच रामानंदीय निर्मोही अखाडा महन्त श्री राम रघुनाथ दास पुजारी श्री राम सकल दास,रामसुभग दास ऐसा वर्णन है। सन 1944 के उ.प्र.गैझेट में, शिया या सुन्नी मुसलमान या वक्फ बोर्ड ने मस्जिद द जन्मस्थान रख रखाव में कोई रूचि नहीं दिखाई।ऐसा लिखा है।

           1949 हिंदू महासभा आंदोलन के पश्चात यह मंदिर न्यायालय संरक्षित,मंदिर परिसर के बाहर दो सौ गज गैरहिन्दू प्रतिबंधित है।चार पुजारी-एक रिसीवर सरकारी वेतन पर सेवारत।जिसका ताला स्व. राजीव गांधी के कार्यकाल में खुला और मुख्यमंत्री-केंद्रीय गृहमंत्री की उपस्थिती में, शिलान्यास हुवा। ऐसे राम जन्मभूमि मंदिर को भाजप ने राजनीतिक-आर्थिक लाभ के लिए कलंक लगाकर आंदोलन आरंभ कर कारसेवकों के प्रेत पर सत्ता पाई और शिलान्यास करनेवाली कांग्रेस ने वोट के लिए बाबरी विध्वंस जांच बैठाई।

भाजप-कांग्रेस की परस्पर पुरक होती राजनीति ने मंदिर को राजनीति और नोट का माध्यम बना दिया -

          सुप्रीम कोर्ट को दिसंबर 2016 को लिखे पत्र पर संज्ञान लेकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने मध्यस्थता स्वीकार की है। वसीम रिझवी राजनीतिक प्रतिनिधी है।उनके प्रस्ताव और मध्यस्थता का कोई औचित्य नहीं। श्रीराम जन्मभूमि वक्फ बोर्ड की संपत्ति नहीं है। 1962 में, सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दावे को पुनर्जीवित रखने के उद्देश्य से, अखिल भारत हिंदू महासभा ने रखी मुर्तिया हटाकर नमाज की अनुमती मांगते हुए याचिका लगाई थी इसका भी कोई संबंध श्रीराम जन्मभूमि से नहीं है।

        मुस्लिम पक्ष की ओर से S.C. में लड़ रहे श्री.धवन साहब को श्रीराम जन्मभूमि पर केवल राजनीतिक उद्देश्य से भ्रम फैलाकर सुनवाई लंबित करने का काम मिला है।
7 जुलाई 2017 शरयु जयंती पर पक्षकार मिले थे और मुस्लिम पक्षकार वैकल्पिक भूमि लेने को तयार थे।श्रीराम जन्मस्थान परिसर की बाउंड्रीवाल बनाने की अनुमति 1885 पक्षकार श्री पंच रामानंदीय निर्मोही आखाड़े को मिली है। केंद्र और प्रदेश सरकार को हिंदू महासभा ने1950 में पार्टी बनाया था। इसलिए 4 अगस्त 2017 को मा. प्रधानमंत्री, मा. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के साथ पक्षकारों की संयुक्त समन्वय बैठक करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री कार्यालय को रजिस्ट्री भेजी गई है।

        सभी प्रमाण मंदिर के पक्ष में होते हुए निर्मोही आखाडा वैकल्पिक भूमि देने को तयार था।क्योंकि, बाबर का हुकमनामा लेकर मीर बांकी श्री पंच रामानंदीय निर्मोही आखाड़े के पास आया था।मंदिर का कब्जा न छोडने पर, मीर बांकी ने निर्मोही महंत श्यामानंद का गला काटकर तोप से मंदिर ध्वस्त किया।परंतु, मस्जिद खडी कर नही पाए।उसी मलबे से चुने गए 14 स्तंभों पर जो वास्तु खडी की गई वह सीता पाकस्थान लिखा गया।मिनार नहीं बने ना वजू स्थान।मात्र परिक्रमा मार्ग बना और स्तंभों पर उत्कीर्ण मूर्तियों की पूजा होती रही।

1/3 हिस्सा छोडने की मुसलमानों की बात पर हिंदू महासभा का विरोध स्पष्टीकरण :-

       1857 युद्धपूर्व वाजिद अली शाह ने मंदिर स्वीकार करने पर, ब्रिटिश सरकार ने विवाद उलझाए रखने के उद्देश्य से, मो. अजगर को फैजाबाद कमिश्नर के पास याचिका डालने को कहा गया था।1887 मो.अजगर ने राम जन्मस्थान मंदिर की दिवार में छेद कर द्वार बनाकर पीछे मैदान में जाकर नमाज की अनुमती मांगी थी।उसका श्री पंच रामानंदीय निर्मोही आखाडा महंत खेमदास ने विरोध किया था।

       मंदिर की पिछली दिवार पर इबादतगाह जैसी निर्मिती करने के बाद भी उसे पीठ दिखाकर,6/7लोगों ने प्रयास किया। क्योंकि, पूर्व की ओर मुंह कर नमाज नही पढी जाती। इस दिवार को1912 में तोडा गया फिर ब्रिटिश सरकार ने खडा किया। 1934 दंगे में तीन विधर्मियों की हत्या के पश्चात से लेकर नमाज हुई नहीं। इस्लाम ऐसे स्थान को नापाक कहता है।यहां मंदिर था, मंदिर बनेगा। श्रीराम जी के न्यायालय पर विश्वास है।

अखिल भारत हिंदू महासभा, राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रमोद पंडित जोशी,कल्याण द्वारा प्रकाशनार्थ