लखनऊ : अपने अध्यक्षीय भाषण में वीर सावरकरजी ने कहा था कि ,हम साहस के साथ वास्तविकता का सामना करे l भारत को आज एकात्म और एकरस राष्ट्र नहीं माना जा सकता,प्रत्युत यहाँ दो राष्ट्र है l  
इस वाक्य को मा.सरसंघचालक स्व.सुदर्शन जी ने दुर्भाग्यपूर्ण कहकर ,उसके कारण परोक्षरूप से जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद का ही अनजाने में अनचाहे समर्थन हो गया l संघ के वरिष्ठ विचारक हो.वे.शेषाद्री जी ने और देश बट गया पुस्तक में,सावरकर द्वारा भारत में दो राष्ट्र स्वीकार करना उचित नहीं ठहराया जा सकता l ऐसा लिखा है।

           परन्तु यह कहने के लिए इतिहास का पूर्वावलोकन आवश्यक है। दिनांक १५ से १८ अक्तूबर १९३७ मुस्लिम लीग द्वारा एक अधिवेशन लखनऊ में हुआ। पारित १९३५ ब्रिटिश संविधान के कम्युनल एवार्ड के अनुसार, संघराज्य प्रणाली अखंड भारत के पक्ष में होने के कारण उसका मुस्लिम लीग के अधिवेशन में हुए विरोध प्रस्तावों के अनुरूप, हिन्दू महासभा वरिष्ठ नेता भाई परमानंदजी ने वर्धा पहुंचकर बैरीस्टर गांधी को संघराज्य प्रणाली को समर्थन के लिये विचार रखा तब सरदार पटेल वहा उपस्थित थे ,दोनो ने इस प्रस्ताव का समर्थन दर्शाया भी परंतु,आगे जो हुआ उसके अनुरूप सावरकरजी ने २७ दिसंबर १९३७ को कर्णावती अधिवेशन में जो विचार रखा क्या वह द्विराष्ट्रवाद था ? या धोखे का संकेत ? जो संकेत दिए वह द्विराष्ट्रवाद के समर्थन में नहीं थे ! अपितु, मुस्लिम राष्ट्र के धोखे को भापकर उसे गहरा पैठा रोग बताया और उसकी चिंता करने के लिए आवाहन किया था। 

 

हिन्दू राष्ट्र एक विचार मंथन -
लेखक प्रमोद पंडित जोशी राष्ट्रीय प्रवक्ता (अखिल भारत हिन्दू महासभा)