होशंगाबाद -  जो हमारे घरों के भीतर-बाहर हमेशा मौजूद रही, उसकी चहक और फ़ंखों की फ़ड़फ़ड़ाहट हमारे जहन में रोजमर्रा की घरेलू आवाजों की तरह थी । लेकिन आज न तो सुबह वह चह्क सुनाई देती है और न ही दोपहर में घर आंगन में बिखरे अनाज के दानों को चोच में दबाकर अपने घोसले तक उड़ान भरने की आवाज l वजह हमारे सामने है और इन वजहों के जिम्मेदार आखिर है कौन ? धरती पर करोड़ों प्रजातियों में से सिर्फ़ हम यानि मनुष्य ही एकमात्र ऐसी प्रजाति है जिसने सह-जीवी जीवन की विधा का बेड़ा गर्क करके रख दिया l जाहिर सी बात है हम इतने विकसित हुए कि प्रकृति की हर मार को झेलने की तकनीक विकसित करते चले गये, इसके दुष्परिणाम भी हमारे सामने है।

               मानव अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए जंगलों को काटते चला जा रहा हैं, विकास की अंधी दौड़ में शामिल हम चहुँ ओर प्रदूषण से घिरते चले जा रहे हैं, कुकुरमुत्ते की तरह जमीन के सीने पर खड़े मोबाइल टावरों से निकलती खतरनाक किरणें यह सब गौरिया जैसी प्यारी और मासूम प्रजातियों के जीवन के लिए आज चुनौती बन गए हैं l कहीं ऐसा न हो कि हमारी इन गलतियों की वजहों से गौरैया जैसी कई प्रजातियों से हम हाथ धो बैंठे और कहीं ये प्रजातियाँ इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर न रह जाएँ l 

              अगर हम वास्तव में चाहते है कि गौरैया फिर से हमारे आंगनों में हमारे बच्चों के बीच चह्चहाये और अपनी खूबसूरती बिखेरे तो हमें अपने आसपास के वातावरण को उनके अनुरूप ढालने के लिए प्रयास करने होंगे l २० मार्च का दिन केवल विश्व गौरैया दिवस ही बनकर न रह जाये इसलिए हम आज संकल्प करें कि गौरैया को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करें और पर्यावरण को उनके जीवन के अनुकूल बनाने का प्रयास करें l ताकि गौरैया जैंसी प्रजातियाँ बिलुप्त न होने पायें l