इंदौर - खबर आ रही है कि इंदौर के एक गाँव में करीब १०६ एकड़ को सरकारी घोषित करने सम्बन्धी कलेक्टर के आदेश को अवैधानिक बताते हुए हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है l इसके साथ ही इस जमीन की एक निजी कम्पनी द्वारा की गई खरीदी-बिक्री डील को भी सही ठहराया गया है l अब यह जमीन वापस निजी घोषित हो गई है l आवासीय भूखंड नियमों के अनुसार इस जमीन की कीमत करोड़ों में हैं l
दरअसल मामला यह है कि यह जमीन १९५८-५९ के दौरान सरकारी थी l सरकार ने इस जमीन को विभिन्न सहकारी समितियों को खेती करने के लिए पट्टे पर दिया था l बाद में यही जमीन सहकारी समितियों से होती हुई निजी लोगों के नाम दर्ज हो गई l २००७-२००८ के दौरान कुछ निजी कम्पनियों ने इस जमीन को खरीद लिया l २०१२ में इस मामले के उठने पर तत्कालीन कलेक्टर ने संज्ञान में लेते हुए सुनवाई की ओर इस जमीन को सरकारी घोषित करते हुए राजस्व रिकार्ड में शासकीय घोषित करने के आदेश दिए l नवम्वर २०१३ में राजस्व विभाग ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी l इसके खिलाफ म.प्र. शासन ने हाईकोर्ट में अपील की जहाँ सुनवाई में उनकी हार हुई l हाईकोर्ट ने कहा की इस जमीन का संज्ञान १८० दिन के भीतर नहीं लिया गया इसलिए यह जमीन सरकारी घोषित नहीं हो सकती है l
ओमेक्स कम्पनी वालों ने कहा कि विधायक ने चुनाव के समय चंदे की मांग की थी जिसे हमने सिरे से नकार दिया था उस बात का ही बदला लेने के लिए विधायक ने यह मामला विधानसभा में उठाया ओर जमीन को शून्य घोषित करवा दिया l ओमेक्स ने यह जमीन जो १०६ एकड़ है वो समितियों से खरीदी गई थी l
मामला मिलीभगत के चलते जबरदस्त तरीके से उलझा हुआ प्रतीत होता है l प्रशासनिक मिलीभगत के चलते पट्टे पर दी गई जमीन को किस तरह देश के मशहूर ओमेक्स कम्पनी ने पलीता लगाकर १०६ एकड़ जमीन को अपने कब्जे में ही नहीं लिया अपितु पूरे प्रशासनिक सिस्टम को तमाचा जड़ दिया है l ओमेक्स आज भी इस जमीन पर कब्ज़ा किये बैठा है l राजस्व मंडल भले ही सुप्रीमकोर्ट में जीतने का दावा कर रहा हो पर सुप्रीमकोर्ट के फैसले से पहले ही म.प्र. सरकार ने इस मामले सहित करेब ३५ अन्य मामलों से अपने हाथ खींच लिए है l