!सिहोर        रेहटी  भले ही सरकार की नजर में भीख मांगना गैर कानूनी,हो लेकिन गांव एवं शहरो में ऐसे बच्चोें की कमी नही है,जिनका बचपन इसी मे बीत रहा है। हैरानी की बात तो ये है कि परिजनों को न तो कानून का भय है और न ही अपने बच्चों के भविष्य की चिंता।एक ओर जहां शिक्षा के अधिकार के तहत प्रत्येक बच्चो को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने के लिये जिला प्रशासन स्कूल चले अभियान चला रहा है,तो वहीं रेहटी सलकनपुर नसरूल्लागंज क्षेत्र सहित जिलेभर के तहसील, कस्बा के अलावा जिला मुख्यालय तक में ऐसे सैकड़ो बच्चे नजर आते है,जो भीख मांगकर अपने परिवार का पालन पोषण करने की बात कहते है। कुछ बच्चे तो ये तक कहते है कि उनके पिता नशे के आदि है,तो वहीं कुछ मासूमों को ये तक नही पता कि उन्हें सरकार ने क्या अधिकार दिये है। ऐसे में जिला प्रशासन के तमाम दावे धरे के धरे रह जाते है।सबसे बड़ी बात तो ये है कि लोग इस बारे में बात तो करते है कि ये बालक भीख क्यों मांग रहा है,आखिर इसकी क्या मजबूरी है,लेकिन अक्सर देखने में आता है कि जब कोई बालक किसी से भीख मांगता है,तो अक्सर उससे लोग बुरा भला कहते है। वहीं बाल श्रम कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु बाले बच्चों से कोई काम नही करवा सकता,लेकिन इसके बाद भी दुकानों पर मासूम काम करते नजर आते है। सबसे अधिक चाय की होटलों एवं किराना दुकानों पर एवं  मैकेनिकों  एवं ठेकेदारो के यह बालक काम करने को मजबूर है। इसके बाद भी न तो प्रशासन कुंभकारिणी नींद से जागा है और न ही श्रम विभाग इस मामलें में कोई ठोस कदम उठा रहा है।यह एक सोचनीय विषय है !